“मंज़िल से पहले खुद को जीतने का सफ़र”
(Manzil Se Pehle Khud Ko Jeetne Ka Safar)
लेखक: कृष्ण सिंह (शिक्षा अनुदेशक)
क्या आपने कभी खुद से हार मानी है?
क्या डर, असफलता और आत्म-संदेह ने आपकी मंज़िल को धुंधला कर दिया है?
यह किताब आपके भीतर की शक्ति को जगाने वाली यात्रा है — जहाँ हर पन्ना आपको खुद से मिलवाएगा।
क्यों पढ़ें यह किताब:
आत्म-जागरूकता का गहरा परिचय – अपने विचारों, भावनाओं और आदतों की जड़ तक पहुंचने का अवसर।
✅ डर से सामना – ‘डर को नाम दो, कागज़ पर उतारो, और पहला साहसिक कदम बढ़ाओ।’ डर की जड़ पर चोट करें।
✅ असफलता में अवसर – “गलती डायरी” से हर हार को जीत में बदलने की व्यावहारिक तकनीक।
✅ आत्म-विश्वास का निर्माण – “मैं कर सकता हूँ” जैसे सरल मंत्र, जो आपके भीतर की ताक़त को रोज़-रोज़ मजबूत बनाते हैं।
✅ अनुशासन के ज़रिए परिवर्तन – आसान, असरदार अभ्यास जो आपके जीवन की दिशा तय करेंगे।
प्रेरणादायक उदाहरण से भरपूर:
“मंच से डर लगता है? सबसे पहले इस डर को पहचानो। फिर एक छोटा सा कदम—किसी अनजान से ‘हेलो’ कहना—आपके भीतर के भय को तोड़ सकता है।”
यह किताब जिंदगी को जीने की कला सिखाती है, धीरे‑धीरे, लेकिन स्थायी रूप से।
आपका आत्मीय मार्गदर्शक, न कि उपदेशक
हर अध्याय एक दोस्त की तरह संवाद करता है — जहाँ आपको लगेगा कि कोई आपके साथ चल रहा है, आपकी बात समझ रहा है।
अगर आप सचमुच खुद को जीतना चाहते हैं…
तो यह किताब सिर्फ पढ़ने की नहीं, जीने की चीज़ है।
“मंज़िल से पहले खुद को जीतना सीखिए — यही असली जीत है।”
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